देवी माँ के शक्तिपीठ

नवरात्रि: व्रत और इसका महत्व

॥देवी माँ के शक्तिपीठ॥

देवी  माँ के शक्तिपीठ वे पवित्र स्थान हैं जहाँ देवी सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे थे। इन स्थानों को बहुत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। प्रमुख रूप से 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं, हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार इनकी संख्या 52 या 108 भी है।

51 शक्तिपीठों का महत्व

इन शक्तिपीठों का निर्माण तब हुआ जब भगवान शिव ने देवी सती के शरीर को लेकर तांडव करना शुरू किया था। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए ताकि शिव का क्रोध शांत हो सके। ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। हर शक्तिपीठ में देवी के एक रूप की पूजा होती है और उनके साथ भैरव (शिव का एक रूप) भी पूजे जाते हैं।

51 शक्तिपीठों की सूची और उनकी जानकारी

  • किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी सती का किरीट (मुकुट) गिरा था। देवी का नाम विमला है।
  • कात्यायनी शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: मथुरा के पास भूतेश्वर में, देवी का केश-गुच्छ (बालों का गुच्छा) गिरा था। देवी का नाम उमा है।
  • करवीर शक्तिपीठ, महाराष्ट्र: यहाँ देवी का त्रिनेत्र (तीसरा नेत्र) गिरा था। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • श्री पर्वत शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर: यहाँ देवी का कंठ (गला) गिरा था। देवी का नाम श्रीमती है।
  • विशालाक्षी शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर देवी का कुंडल (कान का आभूषण) गिरा था। देवी का नाम विशालाक्षी है।
  • गंडकी शक्तिपीठ, नेपाल: यहाँ देवी का दक्षिण (दाहिना) गंड (गाल) गिरा था। देवी का नाम मुक्तिनाथी है।
  • बहुला शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी का बाहु (हाथ) गिरा था। देवी का नाम बहुला है।
  • मंगल चंडिका शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की अंगुलि (अंगुली) गिरी थी। देवी का नाम सर्वमंगला है।
  • उजांनी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की कलाई गिरी थी। देवी का नाम भ्रामरी है।
  • त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरा: यहाँ देवी का दक्षिण पाद (दाहिना पैर) गिरा था। देवी का नाम त्रिपुरसुंदरी है।
  • चट्टल शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी का कपाल (खोपड़ी) गिरा था। देवी का नाम भवानी है।
  • चंद्रनाथ शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी की भुजा (कंधे) गिरी थी। देवी का नाम भवानी है।
  • सुगंधा शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी की नासिका (नाक) गिरी थी। देवी का नाम सुगंधा है।
  • हिंगलाज शक्तिपीठ, पाकिस्तान: यहाँ देवी का ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) गिरा था। देवी का नाम हिंगलाज है।
  • भैरवपर्वत शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी का ओष्ठ (ऊपरी होंठ) गिरा था। देवी का नाम अंबिका है।
  • अट्टहास शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी का अधर (नीचे का होंठ) गिरा था। देवी का नाम फुल्लरा है।
  • महालक्ष्मी शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी का ओष्ठ (ऊपरी होंठ) गिरा था। देवी का नाम कालिका है।
  • अंबिका शक्तिपीठ, राजस्थान: यहाँ देवी के दाँत गिरे थे। देवी का नाम अंबिका है।
  • कामाख्या शक्तिपीठ, असम: यहाँ देवी की योनि गिरी थी। देवी का नाम कामाख्या है।
  • जला देवी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की जीभ गिरी थी। देवी का नाम ज्वालामुखी है।
  • माया देवी शक्तिपीठ, उत्तराखंड: यहाँ देवी का हृदय गिरा था। देवी का नाम माया है।
  • जुगाड़्या शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की कलाई गिरी थी। देवी का नाम योगदा है।
  • नैना देवी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की नेत्र (आँखें) गिरी थीं। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • गुहेश्वरी शक्तिपीठ, नेपाल: यहाँ देवी के घुटने गिरे थे। देवी का नाम महाशिरा है।
  • कालीघाट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी के अंगुष्ठ (दाहिने पैर का अंगूठा) गिरे थे। देवी का नाम कालिका है।
  • किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी के कान गिरे थे। देवी का नाम विमला है।
  • जसोरा शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी के अंगूठे (हाथ के) गिरे थे। देवी का नाम यशोदामती है।
  • महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की दाहिनी जांघ गिरी थी। देवी का नाम चंडी है।
  • जयंती शक्तिपीठ, मेघालय: यहाँ देवी की बाईं जंघा गिरी थी। देवी का नाम महाकाली है।
  • कामाख्या शक्तिपीठ, असम: यहाँ देवी की योनि गिरी थी। देवी का नाम कामाख्या है।
  • अमरनाथ शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर: यहाँ देवी का कंठ (गला) गिरा था। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • भैरवपर्वत शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी के होंठ गिरे थे। देवी का नाम अंबिका है।
  • सोमनाथ शक्तिपीठ, गुजरात: यहाँ देवी का पेट गिरा था। देवी का नाम चामुंडा है।
  • त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरा: यहाँ देवी का दाहिना पैर गिरा था। देवी का नाम त्रिपुरसुंदरी है।
  • कंकाल शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की कंधे की हड्डी गिरी थी। देवी का नाम कंकालेश्वरी है।
  • नकुलेश्वरी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी का बायाँ पैर गिरा था। देवी का नाम नकुलेश्वरी है।
  • लंका शक्तिपीठ, श्रीलंका: यहाँ देवी का घुटना गिरा था। देवी का नाम इंद्रक्षी है।
  • विरजा शक्तिपीठ, ओडिशा: यहाँ देवी की नाभि गिरी थी। देवी का नाम विमला है।
  • ज्वालामुखी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की जीभ गिरी थी। देवी का नाम ज्वालामुखी है।
  • त्रिपुरभैरवी शक्तिपीठ, त्रिपुरा: यहाँ देवी का वस्त्र गिरा था। देवी का नाम त्रिपुरभैरवी है।
  • सुंदर शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की दाईं भुजा गिरी थी। देवी का नाम सुंदरी है।
  • अंबिका शक्तिपीठ, राजस्थान: यहाँ देवी की बाईं भुजा गिरी थी। देवी का नाम अंबिका है।
  • कोल्हापुर शक्तिपीठ, महाराष्ट्र: यहाँ देवी की आँखें गिरी थीं। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • देवीकूप शक्तिपीठ, हरियाणा: यहाँ देवी के एड़ी गिरी थी। देवी का नाम सावित्री है।
  • मनिकर्णिका शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: यहाँ देवी का कुंडल (कान का आभूषण) गिरा था। देवी का नाम विशालाक्षी है।
  • शारदा शक्तिपीठ, पाकिस्तान: यहाँ देवी की दाईं हथेली गिरी थी। देवी का नाम शारदा है।
  • अमरनाथ शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर: यहाँ देवी का गर्दन गिरी थी। देवी का नाम महाकाली है।
  • प्रयाग शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: यहाँ देवी के अंगुलियों (हाथ के) गिरे थे। देवी का नाम ललिता है।
  • भैरवपर्वत शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी का ऊपरी होंठ गिरा था। देवी का नाम अंबिका है।
  • मणिकर्णिका शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: यहाँ देवी के दाँत गिरे थे। देवी का नाम विशालाक्षी है।
  • दक्षिणेश्वर काली मंदिर, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। देवी का नाम भवानी है।

 

शक्तिपीठों की पूजा का फल

इन शक्तिपीठों में दर्शन और पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। ऐसा माना जाता है कि इन स्थानों पर माँ दुर्गा की विशेष कृपा होती है और वे अपने भक्तों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाती हैं। इन मंदिरों में नवरात्रि के दौरान भक्तों की भारी भीड़ रहती है।

 

नवरात्रि: व्रत और इसका महत्व

नवरात्रि: व्रत और इसका महत्व

नवरात्रि एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा के लिए समर्पित है। यह त्योहार पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

नवरात्रि के दौरान, बहुत से लोग नौ दिनों तक व्रत रखते हैं, जिसे उपवास भी कहते हैं। इस व्रत के पीछे कई कारण और मान्यताएं हैं:

  • शारीरिक और मानसिक शुद्धि: व्रत रखने से शरीर और मन को शुद्ध करने में मदद मिलती है। इन नौ दिनों के दौरान, लोग अनाज, दालें और मांसाहारी भोजन से परहेज करते हैं, और केवल फल, दूध, और व्रत के लिए विशेष रूप से बनाए गए भोजन (जैसे कुट्टू का आटा, साबूदाना) का सेवन करते हैं। यह एक प्रकार का डिटॉक्स माना जाता है जो पाचन तंत्र को आराम देता है और शरीर को हल्का महसूस कराता है।
  • आध्यात्मिक लाभ: व्रत के माध्यम से व्यक्ति अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना सीखता है और मन को शांत करता है। यह देवी शक्ति के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को दर्शाता है।
  • आत्म-नियंत्रण और अनुशासन: उपवास एक तरह से आत्म-नियंत्रण का अभ्यास है। यह हमें अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने और जीवन में अनुशासन लाने में मदद करता है।

नवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथा

नवरात्रि का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इसके पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जो देवी दुर्गा और महिषासुर नामक राक्षस के बीच हुए युद्ध से जुड़ी है।

महिषासुर एक बहुत ही शक्तिशाली राक्षस था जिसने भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि उसे कोई भी देवता या पुरुष नहीं मार सकता। इस वरदान के बाद, वह बहुत अहंकारी हो गया और उसने तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, और पाताल) में हाहाकार मचा दिया। उसने देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया और स्वयं स्वर्गलोक पर राज करने लगा।

जब सभी देवता महिषासुर के अत्याचारों से परेशान हो गए, तो उन्होंने त्रिदेवों (भगवान ब्रह्मा, विष्णु, और महेश) से मदद मांगी। तब, त्रिदेवों ने अपनी शक्तियों को मिलाकर एक महाशक्ति को जन्म दिया, जिन्हें देवी दुर्गा के रूप में जाना जाता है। देवी दुर्गा को हर देवता ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए। भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र, और भगवान इंद्र ने वज्र दिया।

इसके बाद, देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ नौ दिनों तक भयंकर युद्ध किया। इस दौरान महिषासुर ने अपने रूप बदलकर देवी को छलने का प्रयास किया, लेकिन देवी दुर्गा ने अपने विभिन्न रूपों और शक्तियों से उसे हराया। अंत में, नौवें दिन, देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया और सृष्टि को उसके आतंक से मुक्त किया।

यह जीत नवमी के दिन हुई, और इस जीत के सम्मान में, नवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। दशहरा का त्योहार इसी विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जब भगवान राम ने रावण का वध किया था, जिसे विजयदशमी भी कहते हैं।

क्या आप नवरात्रि से जुड़े किसी और विषय के बारे में जानना चाहेंगे, जैसे इसके नौ रूप या विभिन्न राज्यों में इसे कैसे मनाया जाता है?

नवरात्रि के 9 दिनों में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। हर दिन एक विशेष रूप को समर्पित होता है।

नवरात्रि के 9 दिन  की पूजा :

पहला दिन: शैलपुत्री

यह देवी दुर्गा का पहला रूप हैं। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। इनका वाहन वृषभ (बैल) है और इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल का फूल होता है।

दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी

देवी का यह रूप तपस्या और वैराग्य का प्रतीक है। इनके दाहिने हाथ में माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है।

तीसरा दिन: चंद्रघंटा

इस रूप में देवी के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। यह रूप शांति, साहस और निडरता का प्रतीक माना जाता है।

चौथा दिन: कूष्मांडा

यह माना जाता है कि देवी कूष्मांडा ने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसलिए इन्हें ‘सृष्टि की आदि शक्ति’ भी कहा जाता है।

पाँचवाँ दिन: स्कंदमाता

देवी का यह रूप भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता का है। इन्हें ममता और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

छठा दिन: कात्यायनी

देवी का यह रूप महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में जाना जाता है। इन्हें दुष्टों का नाश करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।

सातवाँ दिन: कालरात्रि

यह देवी का सबसे उग्र और भयानक रूप है, जो अंधकार और अज्ञान का नाश करता है। यह रूप बुराई का नाश करने का प्रतीक है।

आठवाँ दिन: महागौरी

यह देवी का शांत और सौम्य रूप है। महागौरी की पूजा से पापों का नाश होता है और जीवन में पवित्रता आती है।

नौवाँ दिन: सिद्धिदात्री

देवी का यह रूप सभी प्रकार की सिद्धियाँ (अलौकिक शक्तियाँ) देने वाला है। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

ये नौ रूप मिलकर देवी दुर्गा की पूर्ण शक्ति और उनके विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं।

नवरात्रि के नौ दिनों में हर देवी को एक विशेष रंग और प्रसाद चढ़ाने का भी महत्व है। यह रंग और प्रसाद देवी के गुणों और शक्तियों को दर्शाते हैं।

पहला दिन: शैलपुत्री

  • रंग: नारंगी  – यह रंग ऊर्जा और खुशी का प्रतीक है।
  • प्रसाद: गाय का घी।

दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी

  • रंग: सफेद  – यह शांति, पवित्रता और सादगी का प्रतीक है।
  • प्रसाद: शक्कर (चीनी)।

तीसरा दिन: चंद्रघंटा

  • रंग: लाल  – यह शक्ति, प्रेम और साहस का प्रतीक है।
  • प्रसाद: खीर या दूध से बनी मिठाई।

चौथा दिन: कूष्मांडा

  • रंग: शाही नीला – यह रंग समृद्धि और राजसी शक्ति का प्रतीक है।
  • प्रसाद: मालपुआ।

पाँचवाँ दिन: स्कंदमाता

  • रंग: पीला – यह खुशी, उत्साह और ज्ञान का प्रतीक है।
  • प्रसाद: केले।

छठा दिन: कात्यायनी

  • रंग: हरा  – यह प्रकृति, विकास और नई शुरुआत का प्रतीक है।
  • प्रसाद: शहद।

सातवाँ दिन: कालरात्रि

  • रंग: भूरा – यह रंग शक्ति, समर्पण और स्थिरता का प्रतीक है।
  • प्रसाद: गुड़।

आठवाँ दिन: महागौरी

  • रंग: बैंगनी  – यह रंग आध्यात्मिकता और ज्ञान का प्रतीक है।
  • प्रसाद: नारियल।

नौवाँ दिन: सिद्धिदात्री

  • रंग: मोरपंख हरा – यह रंग इच्छाओं की पूर्ति और नई उम्मीदों का प्रतीक है।
  • प्रसाद: तिल, चने और हलवा।

यह रंग और प्रसाद हर दिन की पूजा को और भी विशेष बनाते हैं।

भारत में माता के कई प्रमुख और प्रसिद्ध मंदिर हैं, जो लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र हैं। इनमें से कुछ सबसे महत्वपूर्ण मंदिर नीचे दिए गए हैं:

  • मैहर देवी मंदिर, जिसे शारदा माता मंदिर भी कहा जाता है, मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित एक बहुत प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यह मंदिर त्रिकूट पर्वत पर लगभग 600 फीट की ऊंचाई पर है।
  • विंध्याचल मंदिर, जिसे माँ विंध्यवासिनी मंदिर भी कहते हैं, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। यह एक प्रमुख शक्तिपीठ है और देवी दुर्गा को समर्पित है।
  • वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू और कश्मीर: त्रिकुटा पर्वत पर स्थित यह मंदिर भारत के सबसे लोकप्रिय शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ हर साल लाखों भक्त माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आते हैं।
  • ज्वाला देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित यह मंदिर देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहाँ कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि नौ ज्वालाएँ लगातार जलती रहती हैं, जो देवी के नौ रूपों का प्रतीक हैं।
  • कामाख्या मंदिर, असम: गुवाहाटी में स्थित यह मंदिर भी एक प्रमुख शक्तिपीठ है। यह भारत के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी मंदिरों में से एक माना जाता है। यहाँ देवी की मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि उनके ‘योनि’ रूप की पूजा की जाती है।
  • महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर, महाराष्ट्र: यह मंदिर देवी महालक्ष्मी को समर्पित है। यहाँ दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं, खासकर नवरात्रि के दौरान।
  • कालिका मंदिर, कालीघाट, पश्चिम बंगाल: यह मंदिर कोलकाता में हुगली नदी के किनारे स्थित है और देवी काली को समर्पित है। यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक है।
  • नैना देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश: यह मंदिर बिलासपुर जिले में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहाँ देवी सती की आँखें गिरी थीं, इसलिए इस स्थान का नाम नैना देवी पड़ा।
  • करणी माता मंदिर, राजस्थान: बीकानेर के पास स्थित यह मंदिर “चूहों वाले मंदिर” के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहाँ हजारों चूहे रहते हैं, जिन्हें पवित्र माना जाता है।
  • अंबाजी माता मंदिर, गुजरात: यह मंदिर गुजरात के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक श्रीयंत्र स्थापित है।

यह कुछ सबसे प्रमुख मंदिर हैं, जहाँ नवरात्रि के समय विशेष पूजा-अर्चना और उत्सव होते हैं। नवरात्रि के दौरान यहाँ भारी भीड़ होती है, क्योंकि इस समय पूजा और उत्सव का विशेष महत्व होता है।

भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव

”भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव” 

भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव जिसे जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, एक वार्षिक हिंदू त्योहार है जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण के जन्म का  उत्सव मनाता है।

तिथि और महत्व

यह त्योहार हिंदू महीने भाद्रपद के कृष्ण पक्ष  की अष्टमी (आठवें दिन) को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर में पड़ता है।

श्री कृष्ण के  अवतार  ने अत्याचारी राजा कंस के शासन का अंत किया। भक्तों के लिए, यह त्योहार इस शाश्वत संदेश की याद दिलाता है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होगी। श्री कृष्ण का जीवन और शिक्षाएँ, विशेष रूप से भगवद गीता में पाई जाने वाली, प्रेरणा का एक स्रोत हैं, जो प्रेम, कर्तव्य और सत्य के महत्व पर जोर देती हैं।

 

कैसे मनाया जाता है

जन्माष्टमी खुशी और भक्ति का दिन है, जिसमें भारत और दुनिया भर के घरों और मंदिरों में उत्सव मनाए जाते हैं। इन समारोहों में अक्सर शामिल होते हैं:

  • उपवास और आधी रात की पूजा: कई भक्त दिन भर का उपवास रखते हैं, जो आधी रात को तोड़ा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि श्री कृष्ण का जन्म इसी समय हुआ था। रातभर, भक्त भक्ति गीत (भजन) गाते हैं और मंत्रों का जाप करते हैं।
  • सजावट और पूजा: घरों और मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। बाल श्री कृष्ण की मूर्तियों (बाल गोपाल) को नहलाया जाता है, नए कपड़े और गहने पहनाए जाते हैं, और एक खूबसूरती से सजे झूले (झूला) में रखा जाता है।
  • दही हांडी: महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में, यह एक लोकप्रिय और ऊर्जावान परंपरा है। यह श्री कृष्ण के बचपन की शरारतों को दर्शाती है, जहाँ वह और उनके दोस्त अपनी माताओं द्वारा ऊँचाई पर लटकाई गई मक्खन की मटकी से मक्खन चुराने के लिए मानव पिरामिड बनाते थे। युवाओं की टीमें (गोविंदा) जमीन से काफी ऊँचाई पर लटकी दही या मक्खन की मटकी को तोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाते हैं।
  • सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ: श्री कृष्ण के जीवन के एपिसोड पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियाँ, जिन्हें रासलीला या श्री कृष्ण लीला के नाम से जाना जाता है, कई जगहों पर आयोजित की जाती हैं, खासकर मथुरा और वृंदावन में, जो उनके जन्म और शुरुआती जीवन से जुड़े स्थान हैं।
  • विशेष प्रसाद: विशेष व्यंजन, विशेष रूप से दूध-आधारित मिठाइयाँ और माखन मिश्री (मक्खन और चीनी), जो श्री कृष्ण के पसंदीदा थे, तैयार किए जाते हैं और देवता को प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाते हैं। 56 व्यंजनों का एक भव्य भोग, जिसे छप्पन भोग के नाम से जाना जाता है, भी एक लोकप्रिय परंपरा है।

भगवान श्री कृष्ण का प्रमुख मंत्र

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”  हिंदू धर्म का एक बहुत ही पूजनीय और शक्तिशाली मंत्र है। इसे द्वादशाक्षरी मंत्र या “बारह-अक्षर वाला मंत्र” भी कहते हैं, जो भगवान श्री कृष्ण (जिन्हें वासुदेव भी कहा जाता है) को समर्पित है।

 

अर्थ और महत्व

  • ॐ (Om): यह ब्रह्मांड की आदिम ध्वनि है, जो परम वास्तविकता का प्रतीक है। माना जाता है कि इसी पवित्र ध्वनि से पूरी सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।
  • नमो (Namo): यह संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है “नमस्कार,” “प्रणाम,” या “आदर।” यह भगवान के सामने झुकने या समर्पण को दर्शाता है।
  • भगवते (Bhagavate): यह भगवान को संदर्भित करता है, जो छह दिव्य गुणों वाले पूजनीय देवता हैं: ज्ञान, शक्ति, बल, यश, सौंदर्य और वैराग्य। इसका अर्थ है “दिव्य” या “भगवान को।”
  • वासुदेवाय (Vasudevaya): यह भगवान श्री कृष्ण का नाम है। इस नाम का शाब्दिक अर्थ “वासुदेव के पुत्र” (उनके पिता का नाम) है, लेकिन इसका एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है: “वह जो सभी प्राणियों में निवास करते हैं और जिसमें सभी प्राणी निवास करते हैं।”

तो, इस पूरे मंत्र नमो भगवते वासुदेवाय” का अर्थ है: हे भगवान वासुदेव, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”

उद्देश्य और लाभ

इस मंत्र का जाप भगवान विष्णु और उनके अवतारों, विशेष रूप से श्री कृष्ण से जुड़ने का एक सीधा और शक्तिशाली तरीका माना जाता है। भक्तों का मानना है कि इसका नियमित जाप करने से:

  • मन और आत्मा शुद्ध होती है: यह जप करने वाले को नकारात्मक विचारों और अहंकार से मुक्त करने में मदद करता है, जिससे मन में शांति और स्पष्टता आती है।
  • मुक्ति (मोक्ष) मिलती है: यह आध्यात्मिक मुक्ति का मंत्र है, जो भक्त को जन्म और मृत्यु के चक्र से परे जाने में मदद करता है।
  • भक्ति बढ़ती है: यह भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण को मजबूत करता है, जिससे आध्यात्मिक संबंध गहरा होता है।
  • सुरक्षा और इच्छाओं की पूर्ति: ऐसा माना जाता है कि यह सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा करता है और सही इच्छाओं को पूरा करने में मदद करता है।

यह हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा का एक मुख्य मंत्र है और इसका जाप दुनिया भर में लाखों लोग प्रार्थना, ध्यान और दैनिक अनुष्ठानों के दौरान करते हैं।

भारत में प्रमुख कृष्ण मंदिर:-

(1)- द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका, गुजरात

यह भारत के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है। यह चार धामों में से एक है, और भगवान कृष्ण के उस रूप को समर्पित है जहाँ उन्होंने द्वारका नगरी की स्थापना की थी। मंदिर का मुख्य शिखर 43 मीटर ऊंचा है और इस पर एक विशाल ध्वज है जिसे दिन में कई बार बदला जाता है।

(2)- श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, मथुरा, उत्तर प्रदेश

यह वह पवित्र स्थान है जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। यह मंदिर उसी जेल की कोठरी पर बना है, जहाँ कृष्ण ने जन्म लिया था। यह दुनिया भर के कृष्ण भक्तों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है।

(3)- बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन, उत्तर प्रदेश

यह वृंदावन के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है, जो बेहद आकर्षक है। माना जाता है कि मूर्ति में कृष्ण और राधा दोनों का दिव्य रूप समाहित है।

(4)- प्रेम मंदिर, वृंदावन, उत्तर प्रदेश

यह एक आधुनिक लेकिन भव्य मंदिर है, जिसे जगद्गुरु कृपालु महाराज ने बनवाया था। यह सफेद संगमरमर से बना है और इसकी सुंदरता और नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर में कृष्ण और राधा के जीवन से संबंधित झांकियाँ और लीलाएं दिखाई गई हैं।

(5)- गोविंद देव जी मंदिर, जयपुर, राजस्थान

यह मंदिर जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान कृष्ण की मूर्ति को जयपुर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने वृंदावन से लाकर स्थापित करवाया था। यह मूर्ति जयपुर के लोगों के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।

(6)- इस्कॉन मंदिर (श्री राधा कृष्ण मंदिर)

इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) द्वारा पूरे विश्व में सैकड़ों इस्कॉन मंदिर बनाए गए हैं। इनमें से प्रमुख मंदिर वृंदावन, दिल्ली, बैंगलोर और मायापुर में हैं। ये मंदिर अपनी भक्तिपूर्ण वातावरण, कीर्तन और कृष्ण भक्ति के प्रचार के लिए जाने जाते हैं।

(7)- जगन्नाथ मंदिर, पुरी, ओडिशा

यह मंदिर भगवान कृष्ण के एक विशेष रूप जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को समर्पित है। यह भी चार धामों में से एक है। रथ यात्रा उत्सव के लिए यह मंदिर विश्वभर में प्रसिद्ध है, जिसमें भगवान की मूर्तियों को विशाल रथों में बिठाकर यात्रा निकाली जाती है।

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मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो-सूरदास

                                                                                                                                                                           Result Plot

॥मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो |
भोर भयो गैयन के पाछे,

भोर भयो गैयन के पाछे,

 मधुवन मोहिं पठायो ।

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

चार पहर बंसीबट भटक्यो,

साँझ परे घर आयो ॥

मैं बालक बहिंयन को छोटो,

छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं,

ग्वाल बाल सब बैर परे हैं,

बरबस मुख लपटायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

तू जननी मन की अति भोरी,

इनके कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है,

जिय तेरे कछु भेद उपजि है,

 जानि परायो जायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

यह लै अपनी लकुटि कमरिया,

बहुतहिं नाच नचायो ।
‘सूरदास’ तब बिहँसि जसोदा,

लै उर कंठ लगायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो |

भोर भयो गैयन के पाछे,

 मधुवन मोहिं पठायो ।

भोर भयो गैयन के पाछे,

 मधुवन मोहिं पठायो ।

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

हरि नाम का आधार: सूरदास जी की भक्ति के माध्यम से मुक्ति की प्राप्ति

                                                                                                                                                                           Result Plot

॥सूरदास जी की रचना : हरि नाम का महत्व और भक्ति के लाभ ॥

Surdas Poetry: हरि नाम का आधार | Spiritual Bhajan in Kalikal

कलिकाल में हरि नाम का आधार

है हरि नाम कौ आधार।
और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥

  • अर्थ: सूरदास जी कहते हैं कि इस कलियुग में केवल हरि नाम ही जीवन का वास्तविक सहारा है। संसार के विधि-विधान और व्यवहार अपने सही मार्ग से भटक गए हैं, लेकिन हरि का नाम ही मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
  • उदाहरण:
    जैसे गहरे समुद्र में नाविक अपनी दिशा खो देता है और केवल तारे (सितारे) के सहारे मार्ग ढूंढता है, वैसे ही हरि का नाम हमें संसार के भंवर से पार लगाता है।

नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।
सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥

  • अर्थ: महर्षि नारद, शुकदेव और भगवान शंकर जैसे महान संतों ने भी यही निष्कर्ष निकाला कि समस्त वेदों का सार हरि भक्ति में ही है। जैसे दूध से घी निकालने के लिए उसे मथा जाता है, वैसे ही हरि भजन वेदों का निचोड़ है।
  • उदाहरण:
    यह ठीक वैसा ही है जैसे खेती के बाद अनाज का चयन किया जाता है और उसमें से सर्वोत्तम दाना निकाला जाता है। हरि भजन भी जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धि है।SHREE BAL KRISHNA JI KI AARTI IN HINDI

दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।
सूर, हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भव-भार॥

  • अर्थ: हरि भजन करते ही दसों दिशाओं के बुरे कर्म और बंधन ऐसे समाप्त हो जाते हैं, जैसे मछली जाल में फंसकर जल से बाहर आ जाती है।
  • उदाहरण:
    यह ठीक वैसे है जैसे सूरज के निकलते ही अंधकार छिप जाता है। हरि का स्मरण करते ही संसार के दुख मिटने लगते हैं।

अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल।
काम क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल॥

अर्थ:
यह पंक्ति सूरदास जी के भक्ति गीत से है, जिसमें वे श्री कृष्ण की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन होने की बात करते हैं। “अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल” का अर्थ है कि श्री कृष्ण के प्रेम में वह नृत्य करते हुए आनंदित हैं। “काम क्रोध” को चोलना (कपड़ा) और “विषय की माल” को कंठ की माला के रूप में दर्शाते हुए, वे कहते हैं कि यह विकार (इच्छाएं और क्रोध) हमें अपने जीवन में पहनने नहीं चाहिए, क्योंकि ये हमारे भक्ति मार्ग में रुकावट डालते हैं।

उदाहरण:
जैसे कोई व्यक्ति अपनी इच्छाओं और क्रोध में फंसा रहता है, वैसे ही हमें इन विकारों से बचना चाहिए और भगवान की भक्ति में नृत्य की तरह लीन होना चाहिए।

संदेश:
सांसारिक मोह-माया और विकारों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए श्री कृष्ण की भक्ति में समर्पित होना चाहिए।

महामोह के नूपुर बाजत, निन्दा सब्द रसाल।
भरम भरयौ मन भयौ पखावज, चलत कुसंगति चाल॥

अर्थ:
सूरदास जी ने इस पंक्ति में संसारिक मोह और भ्रम को दर्शाया है। “महामोह के नूपुर बाजत” का मतलब है कि जब कोई व्यक्ति मोह के बंधन में फंसा होता है, तो उसकी इच्छाओं और भावनाओं की ध्वनियाँ (नूपुर की तरह) निरंतर बजती रहती हैं। “निन्दा सब्द रसाल” का अर्थ है कि संसारिक मोह और भ्रम के कारण व्यक्ति दूसरों की निंदा और बुरी बातें बोलता है। “भरम भरयौ मन भयौ पखावज” में “भरम” का अर्थ है भ्रम और “पखावज” (ढोल) से यहाँ यह संकेत दिया गया है कि भ्रम के कारण मन में डर और असुरक्षा की भावना पैदा होती है। “चलत कुसंगति चाल” का अर्थ है कि गलत संगति और कुविचार से आदमी के कदम गलत दिशा में चलते हैं।

संदेश:
यह पंक्ति यह शिक्षा देती है कि मोह, भ्रम, निंदा और कुविचार के कारण मनुष्य अपनी सच्ची दिशा से भटक जाता है। इसलिए जीवन में सही संगति और सही विचारों को अपनाना चाहिए, ताकि हम सच्चे मार्ग पर चल सकें और हमारे मन में शांति और सुरक्षितता बनी रहे।

तृसना नाद करति घट अन्तर, नानाविध दै ताल।
माया कौ कटि फैंटा बांध्यो, लोभ तिलक दियो भाल॥

अर्थ:
यह पंक्ति यह बताती है कि मनुष्य की तृष्णाएँ और इच्छाएँ उसे मानसिक अशांति देती हैं, जैसे अंदर कई आवाजें गूंजती रहती हैं। माया (संसारिक मोह) ने उसे अपने जाल में फंसा लिया है और लोभ (लालच) ने उसकी पहचान को प्रभावित कर दिया है।

संदेश:
तृष्णा, माया और लोभ मनुष्य को भटका कर उसे सच्चे मार्ग से दूर करते हैं। इनसे बचकर आत्मशांति की ओर बढ़ना चाहिए।

संसार के भंवर से पार लाने वाला हरि का नाम

कोटिक कला काछि दिखराई, जल थल सुधि नहिं काल।
सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नंदलाल॥

अर्थ:
भगवान श्री कृष्ण की असीम लीलाएं और कलाएं सभी स्थानों और समय से परे हैं। सूरदास जी भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उनकी सभी अज्ञानता दूर हो जाए और वे भगवान के दिव्य ज्ञान में समाहित हो जाएं।

संदेश:
भगवान की दिव्य लीलाओं और ज्ञान का अनुभव करने के लिए हमें अपनी अविद्या को दूर करना चाहिए।

प्रभु, हौं सब पतितन कौ राजा।
परनिंदा मुख पूरि रह्यौ जग, यह निसान नित बाजा॥

अर्थ:
यह पंक्ति सूरदास जी की प्रार्थना को व्यक्त करती है, जिसमें वे भगवान से कहते हैं कि वे सभी पापियों और पतितों के राजा हैं। उनके मुख से परनिंदा (दूसरों की निंदा) भर गई है, और यह उनके जीवन का प्रतीक बन गया है।

संदेश:
यह पंक्ति आत्म-स्वीकृति और आत्मनिरीक्षण की ओर इशारा करती है। सूरदास जी अपनी कमियों और पापों को स्वीकारते हुए भगवान से अपने अंदर की बुराईयों को दूर करने की प्रार्थना कर रहे हैं।

तृस्ना देसरु सुभट मनोरथ, इंद्रिय खड्ग हमारे।
मंत्री काम कुमत दैबे कों, क्रोध रहत प्रतिहारे॥

अर्थ:
यह पंक्ति बताती है कि तृष्णा और इच्छाएं हमारे मन में बुराई फैलाने वाले सैनिक की तरह काम करती हैं। इंद्रियां हमारे लिए शस्त्र बन जाती हैं, और काम तथा क्रोध हमारे जीवन में बुराई और भ्रम उत्पन्न करते हैं।

संदेश:
हमारी इंद्रियों और भावनाओं पर नियंत्रण रखना आवश्यक है, क्योंकि तृष्णा, काम और क्रोध जैसे विकार हमें सही मार्ग से भटका सकते हैं।

गज अहंकार चढ्यौ दिगविजयी, लोभ छ्त्र धरि सीस॥
फौज असत संगति की मेरी, ऐसो हौं मैं ईस।

अर्थ:
यह पंक्तियाँ अहंकार और लोभ के प्रभाव को दर्शाती हैं। जैसे हाथी का अहंकार बढ़ता है और वह लोभ में फंसता है, वैसे ही व्यक्ति भी बुरी संगति और गलत भावनाओं से प्रभावित हो जाता है।

संदेश:
अहंकार और लोभ इंसान को सही रास्ते से भटका सकते हैं। हमें इनसे बचने के लिए सतर्क रहना चाहिए।

मोह मदै बंदी गुन गावत, मागध दोष अपार॥
सूर, पाप कौ गढ दृढ़ कीने, मुहकम लाय किंवार॥

अर्थ:
मोह और मद (अहंकार) व्यक्ति को बंदी बना लेते हैं और उसके गुणों को भी झूठा बना देते हैं। सूरदास जी कहते हैं कि पाप के कड़े गढ़ को सुदृढ़ किया है और इससे व्यक्ति का मन बुराईयों से भर जाता है।

संदेश:
मोह और अहंकार इंसान को पाप और गलत मार्ग पर ले जाते हैं, जिससे वह अपनी वास्तविकता को खो बैठता है।

अब कै माधव, मोहिं उधारि।
मगन हौं भव अम्बुनिधि में, कृपासिन्धु मुरारि॥

अर्थ:
यह पंक्तियाँ सूरदास जी की भक्ति को दर्शाती हैं, जहां वे भगवान श्री कृष्ण से अपनी मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं। सूरदास जी कहते हैं कि अब, हे माधव (कृष्ण), मुझे इस संसार के दुखों से उबारो, क्योंकि मैं इस भवसागर में फंसा हुआ हूं। आप ही मेरे लिए कृपा के समुद्र हो, मुझे आपकी कृपा से मोक्ष प्राप्त हो।

संदेश:
सच्चे भक्त के दिल में भगवान की कृपा की आवश्यकता होती है ताकि वह संसार के मोह और दुखों से मुक्त हो सके।

हरि नाम से मुक्ति प्राप्ति की प्रक्रिया

नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग।
लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥

अर्थ:
यह पंक्तियाँ माया के प्रभाव को व्यक्त करती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि माया एक गहरी और अथाह जल की तरह है, जिसमें लोभ की लहरें उठती हैं। जब व्यक्ति इस गहरे जल में फंसता है, तो वह मोह और लोभ के जाल में पकड़ा जाता है, जैसे अनंग (अप्राकृतिक आकर्षण) द्वारा व्यक्ति को पकड़ लिया जाता है।

संदेश:
माया और लोभ का प्रभाव बहुत गहरा होता है, और व्यक्ति जब इनसे प्रभावित होता है तो वह अंधकार में फंस जाता है।

मीन इन्द्रिय अतिहि काटति, मोट अघ सिर भार।
पग न इत उत धरन पावत, उरझि मोह सिबार

अर्थ:
जैसे मछली अपने इन्द्रिय को पकड़ने के कारण निरंतर संघर्ष करती है, वैसे ही हमारी इन्द्रियाँ हमें पाप और मोह में फंसा देती हैं। मनुष्य अपने पथ पर सही कदम नहीं रख पाता, क्योंकि वह मोह के जाल में उलझ जाता है।

संदेश:
यह शेर इन्द्रियों के वशीभूत होने से होने वाले मानसिक उलझन और मोह के प्रभाव को दर्शाता है, जो व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने से रोकता है।

काम क्रोध समेत तृष्ना, पवन अति झकझोर।
नाहिं चितवत देत तियसुत नाम-नौका ओर॥

अर्थ:
काम, क्रोध और तृष्णा के तूफान में मन बहुत विचलित है, जैसे तेज़ हवा द्वारा झकझोरा जा रहा हो। लेकिन ध्यान नहीं केंद्रित हो पा रहा है और वह नाम-नौका (कृष्ण का नाम) का सहारा नहीं ले पा रहा है।

संदेश:
यह शेर व्यक्ति के भीतर के विकारों (काम, क्रोध, तृष्णा) के प्रभाव को दर्शाता है, जो मन को परेशान करते हैं और भगवान के नाम का स्मरण करने में रुकावट डालते हैं।

थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल, सुनहु करुनामूल।
स्याम, भुज गहि काढ़ि डारहु, सूर ब्रज के कूल॥

अर्थ:
मैं बीच मार्ग में थक कर बेहाल हो गया हूँ। कृपया सुनो, करुणा के स्रोत स्याम (कृष्ण)! तुम मेरी बाहों को पकड़कर मुझे उद्धार करो और ब्रज के किनारे पर ले आओ।

संदेश:
यह शेर भगवान श्री कृष्ण से मदद की प्रार्थना है, जिसमें भक्त अपने दुखों और संघर्षों से राहत पाने के लिए भगवान की शरण में आता है।

SHREE RAM PRABHU KI STUTI IN HINDI

कब तुम मोसो पतित उधारो।
पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो

अर्थ:
हे भगवान, कब तुम मुझे, जो पतितों में सबसे बड़ा पतित हूँ, उधार (बचाओ) करोगे? मैं तो वही व्यक्ति हूँ, जो पापों से लिप्त है, लेकिन तुम अपने पवित्र नाम से मुझे उद्धार दो।

संदेश:
यह शेर भगवान से क्षमा और उद्धार की प्रार्थना है। यह दिखाता है कि पापी व्यक्ति भी भगवान के नाम से शुद्ध हो सकता है।

बड़े पतित पासंगहु नाहीं, अजमिल कौन बिचारो।
भाजै नरक नाम सुनि मेरो, जमनि दियो हठि तारो॥

अर्थ:
जो बहुत बड़े पापी होते हैं, उनके पास भी कोई बचाव नहीं होता। अजमिल जैसे पापी के बारे में सोचें, जिन्होंने नरक में जाने के बावजूद भगवान का नाम लिया और यमराज से बच गए। सूरदास कहते हैं कि, पापी भी भगवान के नाम से मुक्ति पा सकते हैं।

संदेश:
यह शेर बताता है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, भगवान के नाम से अपना उद्धार कर सकता है।

छुद्र पतित तुम तारि रमापति, जिय जु करौ जनि गारो।
सूर, पतित कों ठौर कहूं नहिं, है हरि नाम सहारो॥

अर्थ:
हे राम के पतिके, तुम सबको उबारने वाले हो, चाहे वह कितने भी छोटे या पापी क्यों न हों। सूरदास कहते हैं कि, पापियों के लिए कोई ठिकाना नहीं है, परंतु भगवान का नाम ही उनका सहारा है।

संदेश:
यह शेर भगवान की कृपा और उनके नाम की महिमा को दर्शाता है। भगवान का नाम पापियों को भी उबारने में सक्षम है, और यही उनका सर्वोत्तम सहारा है।

जसोदा हरि पालनै झुलावै।

हलरावै दुलरावै मल्हावै जोई सोई कछु गावै।।

अर्थ:
माँ यशोदा भगवान श्री कृष्ण को पालती हैं, उन्हें झुलाती हैं, दुलार करती हैं और उन्हें शरारतें दिखाती हैं। जो कुछ भी वह करती हैं, वह भगवान की लीलाओं का एक रूप होता है।

संदेश:
यह शेर माँ यशोदा की कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और उनके प्रति ममता को दर्शाता है। भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं की सुंदरता और दिव्यता का प्रतीक है।

मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै।

तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै।।

अर्थ:
माँ यशोदा भगवान श्री कृष्ण से कह रही हैं कि मेरे लाल, तू क्यों नहीं सोता? यदि तू सोने में न आ रहा है तो कृष्ण को बुलाने से वो तुझे सोने का सुख देंगे।

संदेश:
यह शेर माँ यशोदा की ममता और भगवान श्री कृष्ण की लीला को दर्शाता है, जिसमें माँ अपने लाल को शांति और सुकून की प्राप्ति के लिए कृष्ण की दिव्य शक्ति को याद करती हैं।

कबहुं पलक हरि मुंदी लेत हैं कबहुं अधर फरकावै।

सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै।I

अर्थ:
कभी भगवान श्री कृष्ण अपनी पलकें बंद कर लेते हैं, कभी अपने अधरों को हलका सा हिलाते हैं। वे सोते समय भी मौन रहते हुए अपनी लीलाओं का संकेत करते हैं और अपनी भक्ति का अनुभव कराने के लिए चुपके से अपनी दिव्य उपस्थिति का एहसास कराते हैं।

संदेश:
यह शेर भगवान की अदा और लीला की गहराई को दर्शाता है, जहां वे अपनी साधारणता में भी अद्वितीय और दिव्य होते हैं।

इहि अंतर अकुलाइ उठे हरी जसुमति मधुरै गावै।

जो सुख सुर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनी पावै।।

अर्थ:
माता यशोदा के ह्रदय में कृष्ण के प्रति अपार प्रेम जाग्रत होता है, और उनके प्रेम में अत्यधिक उल्लास और आनंद है। यह आनंद इतना विशिष्ट और दुर्लभ है कि वह सुख, जो देवताओं, मुनियों और अमरों के लिए भी कठिन है, वह नंदनी (यशोदा) को प्राप्त हुआ है।

संदेश:
यह शेर भगवान श्री कृष्ण के प्रति माता यशोदा के अत्यधिक प्रेम और समर्पण को दर्शाता है, जो उन सुखों और आनंदों से भी अधिक है, जिनका अनुभव देवता और साधक नहीं कर पाते।

मैं नहीं माखन खायो मैया। मैं नहीं माखन खायो।

ख्याल परै ये सखा सबै मिली मेरैं मुख लपटायो।।

अर्थ:
कृष्णा माता यशोदा से कहते हैं, “मैया, मैंने माखन नहीं खाया है।” लेकिन उनके मित्र (सखा) उन्हें ललचाकर कहते हैं कि कृष्ण के मुँह में माखन लगा हुआ है, इसलिए वह झूठ बोल रहे हैं। कृष्ण अपनी मासूमियत और शरारतों से माता का दिल जीतने की कोशिश करते हैं।

संदेश:
यह शेर कृष्ण की मासूमियत और प्रेम को दर्शाता है, जिसमें वह अपनी शरारतों से माता का दिल मोहित करते हैं और ईश्वर के भक्तों के प्रति उनकी स्नेहभावना व्यक्त करते हैं।

देखि तुही छींके पर भजन ऊँचे धरी लटकायो।

हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो।।

अर्थ:
सूरदास जी कहते हैं कि जब यशोदा माता ने देखा कि कृष्ण ने माखन की चोरी की है और वह माखन मुँह में लेकर छींके पर चढ़ कर भजन गा रहे हैं, तो यशोदा माता ने उन्हें डांटा। वह सोच रही थीं कि भगवान की लीला कैसी अजीब है, वे छोटे बच्चे होकर भी इतने नटखट हैं।

संदेश:
ईश्वर की लीला अनंत और अप्रतिम होती है। उनकी मासूमियत और क्रीतियों में दिव्यता होती है, जो हमें जीवन में सच्ची भक्ति का मार्ग दिखाती है।

मुख दधि पोंछी बुध्दि एक किन्हीं दोना पीठी दुरायो।

डारी सांटी मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो।।

अर्थ:
सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण ने माखन खाया, मुंह में दूध लगा लिया था। जब यशोदा ने उनका मुंह साफ किया, तो कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपनी मां को गले लगा लिया। उनका प्यार और मासूमियत देखकर यशोदा प्रसन्न हो गईं।

संदेश:
भगवान की मासूमियत और सरलता ही उनकी दिव्यता का सबसे प्यारा रूप है, जो हर दिल को छू जाता है।

बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो।

सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो।।

अर्थ:
सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण का बाल रूप देखकर उनकी माया में बसा मन परम आनंदित होता है और भक्ति प्राप्त करने का वास्तविक सुख देखने को मिलता है। यह सुख भगवान शिव और ब्रह्मा जी को भी प्राप्त नहीं हुआ है, जो नंदनी यशोदा को मिला।

संदेश:
भगवान के बाल रूप की भक्ति और उनकी सरलता में अपार सुख छिपा है, जिसे कोई और नहीं पा सकता।

है हरि नाम कौ आधार।
और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥

अर्थ:
सूरदास जी कहते हैं कि इस कलिकाल में केवल हरि का नाम ही जीवन का असली आधार है, और इस समय कोई भी अन्य उपाय विधि या धर्म के अनुसार फलदायी नहीं है।

संदेश:
हरि के नाम का जप ही इस कलिकाल में सबसे प्रभावी और जीवन को उद्धार देने वाला साधन है।

नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।
सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥

अर्थ:
सूरदास जी कहते हैं कि नारद, सुकदेव, शंकर आदि महापुरुषों ने यही विचार किया और सभी वेदों को अच्छे से समझा। जैसे दही को मथकर घी निकाला जाता है, वैसे ही वेदों में से भगवान के श्रेष्ठतम ज्ञान (घृत) को प्राप्त किया।

संदेश:
भगवान का सच्चा ज्ञान वेदों से प्राप्त होता है, और यह ज्ञान आत्मा की शुद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।
सूर, हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भव-भार॥

अर्थ:
सूरदास जी कहते हैं कि जैसे मछली को जल में जाल से फंसाया जाता है और वह जाल में उलझ जाती है, वैसे ही व्यक्ति संसार के बंधनों में फंस जाता है। लेकिन जब वह भगवान के भजन में रत होता है, तो उसकी सारी कष्‍ट मिट जाते हैं और वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।

संदेश:
भगवान के भजन और ध्यान से ही संसार के बंधनों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति का जीवन सहज एवं शुद्ध हो जाता है।

 

भगवदगीता के 8 सबसे लोकप्रिय श्लोक

                                                                                                                                                                           Result Plot

भगवदगीता के 8 सबसे लोकप्रिय श्लोक

श्री यशोदा का परम दुलारा,बाबा के अँखियन का तारा ।
गोपियन के प्राणन से प्यारा,इन पर प्राण न्योछावर कीजै ॥

बलदाऊ के छोटे भैया,कनुआ कहि कहि बोले मैया ।
परम मुदित मन लेत बलैया,अपना सरबस इनको दीजै ॥

 

  • यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:
    अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अर्थ:-

हे भारत, जब-जब धर्म का लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।

  • नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:
    चैनं क्लेदयन्त्यापो शोषयति मारुत:

अर्थ: –

आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है।

  • हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
    तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:
    अर्थ: –

हे कौन्तेय यदि तुम युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख को भोगोगे,इसलिए उठो, हे कौन्तेय , और निश्चय करके युद्ध करो।

  • कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
    अर्थ:-
    कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फल में नही है। इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही कर्म करने में तुम्हारी आसक्ति हो।
  • परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय दुष्कृताम्।
    धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगेयुगे॥

अर्थ: –

सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए , दुष्कर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युगों-युगों में जन्म लेता आया हूं।

 

  • क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:
    स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
    अर्थ:-
    क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है इससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है।

 

  • सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज:।

           अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

अर्थ:-

हे अर्जुन सभी धर्मों को त्याग कर अर्थात हर आश्रय को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं  तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दूंगा, इसलिए शोक मत करो।

  • ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
    सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
    अर्थ: –

विषयों  के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है।

 

श्री यशोदा का परम दुलारा,बाबा के अँखियन का तारा ।
गोपियन के प्राणन से प्यारा,इन पर प्राण न्योछावर कीजै ॥

बलदाऊ के छोटे भैया,कनुआ कहि कहि बोले मैया ।
परम मुदित मन लेत बलैया,अपना सरबस इनको दीजै ॥

 

श्री राम-लक्ष्मण और परशुराम-संवाद

                                                                                                                                                                           Result Plot

॥श्री राम-लक्ष्मण और परशुराम-संवाद॥

चौपाई :

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥
तेहिं अवसर सुनि सिवधनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥

देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने॥
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा॥
सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिस बस कछुक अरुन होइ आवा॥
भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥

बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥
कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥

दोहा :

सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप।
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥

चौपाई :

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥

जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥

आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥

रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥

दोहा :

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥

चौपाई :

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥

मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥

दोहा :

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोलेरघुबीरु॥

चौपाई :

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥

सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥

बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

दोहा :

रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥

चौपाई :

लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें॥

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥
बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥

बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही॥

भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥
सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥

दोहा :

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥

चौपाई :

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥

इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥

भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥

बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥

दोहा :

जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर॥

चौपाई :

कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥
भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥

काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥
तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥

लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥

नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥

दोहा :

 सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥

चौपाई :

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥

उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥

न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥

दोहा :

गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।

अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥

चौपाई :

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा॥

माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥

सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥

अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥

सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥

भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपदोही॥

मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बा़ढ़े॥

अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥

दोहा :

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।

बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥

चौपाई :

नाथ करहु बालक पर छोहु। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥

जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥

जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥

करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥

राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने॥

हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥

गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूट मुख पयमुख नाहीं॥

सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मोही॥

दोहा :

लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।

जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल॥

चौपाई :

मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥

टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥

जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥

बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥

थर थर काँपहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥

भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होई बल हानी॥

बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥

मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें॥

दोहा :

सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।

गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥

चौपाई :

अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥

सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥

बररै बालकु एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ ॥

तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा॥

कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाईं॥

कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥

कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें॥

एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं कहा कोपु करि कीन्हा॥

दोहा :

गर्भ स्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।

परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर॥

चौपाई :

बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥

भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥

आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा॥

बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥

जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता॥

देखु जनक हठि बालकु एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥

बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृपु ढोटा॥

बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥

दोहा :

परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।

संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु॥2

चौपाई :

बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥

करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥

छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥

भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ॥

गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥

टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥

राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥

जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानिअ आपन अनुगामी॥

दोहा :

प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।

बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥

चौपाई :

देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥

नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा॥

जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥

छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥

हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा॥

राम मात्र लघुनाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥

देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥

सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥

दोहा :

बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।

बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधू सम बाम॥

निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥

चाप सुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू॥

समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥

मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥

मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥

भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥

राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥

छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अभिमाना॥

दोहा :

जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।

तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥

चौपाई :

देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥

जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ ॥

छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना॥

कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥

बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥

सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपत के। उघरे पटल परसुधर मति के॥

राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥

देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥

दोहा :

जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।

जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात॥

चौपाई :

जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥

जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥

बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर॥

सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा॥

करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा॥

अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता॥

कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥

अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने॥

 

 

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी -श्रीराम स्तुति:

                                                                                                                                                                           Result Plot

॥भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी – श्रीराम स्तुति:

।।जय श्रीराम।।

जब श्री राम जी का प्राकट्य हुआ और माता कौशल्या ने उन्हें चतुर्भुज रूप में देखा तो वो आनंद से भर गई।गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि श्री राम जी का रूप देखकर माता कौशल्या उनकी स्तुति करती हैं और कहती है कि आपका जो रूप मेरे हृदय में बस जाए वो बाल रूप धारण करे। आपने मुझे दर्शन देकर मेरे जन्मो की तपस्या को सफल किया है । हे प्रभु ये रूप त्यागकर बाल रूप में आइए और बाल लीला कीजिए।माता कौशल्या का श्री राम जी से संवाद नीचे वर्णित है ।

 

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।

हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी ।

भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी ॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता ।

माया गुअन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता ॥

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।

सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रकट श्रीकंता ॥

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै ।

मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ॥

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।

कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा ।

कीजे सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा ।

यह चरित जे गावहि हरिपद पावहि ते न परहिं भवकूपा ॥

     बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ।

     निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥

 

नमामि भक्त वत्सलम्-श्रीराम स्तुति:

                                                                                                                                                                           Result Plot

॥श्रीराम स्तुति: – नमामि भक्त वत्सलम्॥

जय श्री राम। भगवान श्रीराम को जब अत्रि मुनि ने देखा तब मुनि उनको देखकर प्रसन्न हो गए। अत्रि मुनि अत्याधिक प्रसन्न हो गए कि उनको  शब्द ही नहीं समझ आ रहे थे प्रभु की स्तुति करने के लिए। अरण्य कांड में श्री गोस्वामी तुलसी दास जी ने बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। अत्रि मुनि ने जो प्रभु श्रीराम जी की स्तुति की है वो यहां पर निम्लिखित है। सुबह सवेरे इसका भजन और श्रवण करने से मन चिंतामुक्त हो जाता है।

 

नमामि भक्त वत्सलम् । कृपालु शील कोमलम् ॥

भजामि ते पदांबुजम् । अकामिनाम् स्वधामदम् ॥

निकाम् श्याम् सुंदरम् । भवाम्बुनाथ मंदरम् ॥

प्रफुल्ल कंज लोचनम् । मदादि दोष मोचनम् ॥

 प्रलंब बाहु विक्रमम् । प्रभोऽप्रमेय वैभवम् ॥

निषंग चाप सायकम् । धरम् त्रिलोक नायकम् ॥

दिनेश वंश मंदनम् । महेश चाप खंदनम् ॥

मुनींद्र संत रंजनम् । सुरारि वृन्द भंजनम् ॥

मनोज वैरि वंदितम् । अजादि देव सेवितम् ॥

विशुद्ध बोध विग्रहम् । समस्त दूषणापहम् ॥

नमामि इंदिरा पतिम् । सुखाकरम् सताम् गतिम् ॥

भजे सशक्ति सानुजम् । शची पति प्रियानुजम् ॥

त्वदंघ्रि मूल ये नराह । भजंति हीन मत्सराह ॥

 

पतंति नो भवार्णवे । वितर्क वीचि संकुले ॥

विविक्त वासिनह सदा । भजंति मुक्तये मुदा ॥

निरस्य इंद्रियादिकम् । प्रयांति ते गतिम् स्वकम् ॥

तमेकमद्भुतम् प्रभुम् । निरीहमीश्वरम् विभुम् ॥

जगद्गुरुम् च शाश्वतम् । तुरीयमेव केवलम् ॥

भजामि भाव वल्लभम् । कुयोगिनाम् सुदुर्लभम् ॥

 स्वभक्त कल्प पादपम् । समम् सुसेव्यमन्वहम् ॥

 अनूप रूप भूपतिम् । नतोऽहमुर्विजा पतिम् ॥

प्रसीद मे नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥

पठंति ये स्तवम् इदम् । नरादरेण ते पदम् ॥

व्रजंति नात्र संशयम् । त्वदीय भक्ति संयुताह ॥

 

Sita ji ki aarti

॥श्री सीताजी की आरती॥

आरती श्री जनक दुलारी की ।

सीता जी रघुवर प्यारी की ॥

जगत जननी जग की विस्तारिणी,

नित्य सत्य साकेत विहारिणी,

परम दयामयी दिनोधारिणी,

सीता मैया भक्तन हितकारी की ॥

आरती श्री जनक दुलारी की ।

सीता जी रघुवर प्यारी की ॥

सती शिरोमणि पति हितकारिणी,,

पति सेवा वित्त वन वन चारिणी,

पति हित पति वियोग स्वीकारिणी,

त्याग धर्म मूर्ति धरी की ॥

आरती श्री जनक दुलारी की ।

सीता जी रघुवर प्यारी की ॥

विमल कीर्ति सब लोकन छाई,

नाम लेत पवन मति आई,

सुमीरत काटत कष्ट दुख दाई,

शरणागत जन भय हरी की ॥

आरती श्री जनक दुलारी की ।

सीता जी रघुवर प्यारी की ॥