देवी माँ के शक्तिपीठ

नवरात्रि: व्रत और इसका महत्व

॥देवी माँ के शक्तिपीठ॥

देवी  माँ के शक्तिपीठ वे पवित्र स्थान हैं जहाँ देवी सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे थे। इन स्थानों को बहुत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। प्रमुख रूप से 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं, हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार इनकी संख्या 52 या 108 भी है।

51 शक्तिपीठों का महत्व

इन शक्तिपीठों का निर्माण तब हुआ जब भगवान शिव ने देवी सती के शरीर को लेकर तांडव करना शुरू किया था। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए ताकि शिव का क्रोध शांत हो सके। ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। हर शक्तिपीठ में देवी के एक रूप की पूजा होती है और उनके साथ भैरव (शिव का एक रूप) भी पूजे जाते हैं।

51 शक्तिपीठों की सूची और उनकी जानकारी

  • किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी सती का किरीट (मुकुट) गिरा था। देवी का नाम विमला है।
  • कात्यायनी शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: मथुरा के पास भूतेश्वर में, देवी का केश-गुच्छ (बालों का गुच्छा) गिरा था। देवी का नाम उमा है।
  • करवीर शक्तिपीठ, महाराष्ट्र: यहाँ देवी का त्रिनेत्र (तीसरा नेत्र) गिरा था। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • श्री पर्वत शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर: यहाँ देवी का कंठ (गला) गिरा था। देवी का नाम श्रीमती है।
  • विशालाक्षी शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर देवी का कुंडल (कान का आभूषण) गिरा था। देवी का नाम विशालाक्षी है।
  • गंडकी शक्तिपीठ, नेपाल: यहाँ देवी का दक्षिण (दाहिना) गंड (गाल) गिरा था। देवी का नाम मुक्तिनाथी है।
  • बहुला शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी का बाहु (हाथ) गिरा था। देवी का नाम बहुला है।
  • मंगल चंडिका शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की अंगुलि (अंगुली) गिरी थी। देवी का नाम सर्वमंगला है।
  • उजांनी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की कलाई गिरी थी। देवी का नाम भ्रामरी है।
  • त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरा: यहाँ देवी का दक्षिण पाद (दाहिना पैर) गिरा था। देवी का नाम त्रिपुरसुंदरी है।
  • चट्टल शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी का कपाल (खोपड़ी) गिरा था। देवी का नाम भवानी है।
  • चंद्रनाथ शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी की भुजा (कंधे) गिरी थी। देवी का नाम भवानी है।
  • सुगंधा शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी की नासिका (नाक) गिरी थी। देवी का नाम सुगंधा है।
  • हिंगलाज शक्तिपीठ, पाकिस्तान: यहाँ देवी का ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) गिरा था। देवी का नाम हिंगलाज है।
  • भैरवपर्वत शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी का ओष्ठ (ऊपरी होंठ) गिरा था। देवी का नाम अंबिका है।
  • अट्टहास शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी का अधर (नीचे का होंठ) गिरा था। देवी का नाम फुल्लरा है।
  • महालक्ष्मी शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी का ओष्ठ (ऊपरी होंठ) गिरा था। देवी का नाम कालिका है।
  • अंबिका शक्तिपीठ, राजस्थान: यहाँ देवी के दाँत गिरे थे। देवी का नाम अंबिका है।
  • कामाख्या शक्तिपीठ, असम: यहाँ देवी की योनि गिरी थी। देवी का नाम कामाख्या है।
  • जला देवी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की जीभ गिरी थी। देवी का नाम ज्वालामुखी है।
  • माया देवी शक्तिपीठ, उत्तराखंड: यहाँ देवी का हृदय गिरा था। देवी का नाम माया है।
  • जुगाड़्या शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की कलाई गिरी थी। देवी का नाम योगदा है।
  • नैना देवी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की नेत्र (आँखें) गिरी थीं। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • गुहेश्वरी शक्तिपीठ, नेपाल: यहाँ देवी के घुटने गिरे थे। देवी का नाम महाशिरा है।
  • कालीघाट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी के अंगुष्ठ (दाहिने पैर का अंगूठा) गिरे थे। देवी का नाम कालिका है।
  • किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी के कान गिरे थे। देवी का नाम विमला है।
  • जसोरा शक्तिपीठ, बांग्लादेश: यहाँ देवी के अंगूठे (हाथ के) गिरे थे। देवी का नाम यशोदामती है।
  • महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की दाहिनी जांघ गिरी थी। देवी का नाम चंडी है।
  • जयंती शक्तिपीठ, मेघालय: यहाँ देवी की बाईं जंघा गिरी थी। देवी का नाम महाकाली है।
  • कामाख्या शक्तिपीठ, असम: यहाँ देवी की योनि गिरी थी। देवी का नाम कामाख्या है।
  • अमरनाथ शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर: यहाँ देवी का कंठ (गला) गिरा था। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • भैरवपर्वत शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी के होंठ गिरे थे। देवी का नाम अंबिका है।
  • सोमनाथ शक्तिपीठ, गुजरात: यहाँ देवी का पेट गिरा था। देवी का नाम चामुंडा है।
  • त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरा: यहाँ देवी का दाहिना पैर गिरा था। देवी का नाम त्रिपुरसुंदरी है।
  • कंकाल शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी की कंधे की हड्डी गिरी थी। देवी का नाम कंकालेश्वरी है।
  • नकुलेश्वरी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी का बायाँ पैर गिरा था। देवी का नाम नकुलेश्वरी है।
  • लंका शक्तिपीठ, श्रीलंका: यहाँ देवी का घुटना गिरा था। देवी का नाम इंद्रक्षी है।
  • विरजा शक्तिपीठ, ओडिशा: यहाँ देवी की नाभि गिरी थी। देवी का नाम विमला है।
  • ज्वालामुखी शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की जीभ गिरी थी। देवी का नाम ज्वालामुखी है।
  • त्रिपुरभैरवी शक्तिपीठ, त्रिपुरा: यहाँ देवी का वस्त्र गिरा था। देवी का नाम त्रिपुरभैरवी है।
  • सुंदर शक्तिपीठ, हिमाचल प्रदेश: यहाँ देवी की दाईं भुजा गिरी थी। देवी का नाम सुंदरी है।
  • अंबिका शक्तिपीठ, राजस्थान: यहाँ देवी की बाईं भुजा गिरी थी। देवी का नाम अंबिका है।
  • कोल्हापुर शक्तिपीठ, महाराष्ट्र: यहाँ देवी की आँखें गिरी थीं। देवी का नाम महालक्ष्मी है।
  • देवीकूप शक्तिपीठ, हरियाणा: यहाँ देवी के एड़ी गिरी थी। देवी का नाम सावित्री है।
  • मनिकर्णिका शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: यहाँ देवी का कुंडल (कान का आभूषण) गिरा था। देवी का नाम विशालाक्षी है।
  • शारदा शक्तिपीठ, पाकिस्तान: यहाँ देवी की दाईं हथेली गिरी थी। देवी का नाम शारदा है।
  • अमरनाथ शक्तिपीठ, जम्मू और कश्मीर: यहाँ देवी का गर्दन गिरी थी। देवी का नाम महाकाली है।
  • प्रयाग शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: यहाँ देवी के अंगुलियों (हाथ के) गिरे थे। देवी का नाम ललिता है।
  • भैरवपर्वत शक्तिपीठ, मध्य प्रदेश: यहाँ देवी का ऊपरी होंठ गिरा था। देवी का नाम अंबिका है।
  • मणिकर्णिका शक्तिपीठ, उत्तर प्रदेश: यहाँ देवी के दाँत गिरे थे। देवी का नाम विशालाक्षी है।
  • दक्षिणेश्वर काली मंदिर, पश्चिम बंगाल: यहाँ देवी के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। देवी का नाम भवानी है।

 

शक्तिपीठों की पूजा का फल

इन शक्तिपीठों में दर्शन और पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। ऐसा माना जाता है कि इन स्थानों पर माँ दुर्गा की विशेष कृपा होती है और वे अपने भक्तों को सभी कष्टों से मुक्ति दिलाती हैं। इन मंदिरों में नवरात्रि के दौरान भक्तों की भारी भीड़ रहती है।

 

नवरात्रि: व्रत और इसका महत्व

नवरात्रि: व्रत और इसका महत्व

नवरात्रि एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा के लिए समर्पित है। यह त्योहार पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

नवरात्रि के दौरान, बहुत से लोग नौ दिनों तक व्रत रखते हैं, जिसे उपवास भी कहते हैं। इस व्रत के पीछे कई कारण और मान्यताएं हैं:

  • शारीरिक और मानसिक शुद्धि: व्रत रखने से शरीर और मन को शुद्ध करने में मदद मिलती है। इन नौ दिनों के दौरान, लोग अनाज, दालें और मांसाहारी भोजन से परहेज करते हैं, और केवल फल, दूध, और व्रत के लिए विशेष रूप से बनाए गए भोजन (जैसे कुट्टू का आटा, साबूदाना) का सेवन करते हैं। यह एक प्रकार का डिटॉक्स माना जाता है जो पाचन तंत्र को आराम देता है और शरीर को हल्का महसूस कराता है।
  • आध्यात्मिक लाभ: व्रत के माध्यम से व्यक्ति अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना सीखता है और मन को शांत करता है। यह देवी शक्ति के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को दर्शाता है।
  • आत्म-नियंत्रण और अनुशासन: उपवास एक तरह से आत्म-नियंत्रण का अभ्यास है। यह हमें अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने और जीवन में अनुशासन लाने में मदद करता है।

नवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथा

नवरात्रि का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इसके पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जो देवी दुर्गा और महिषासुर नामक राक्षस के बीच हुए युद्ध से जुड़ी है।

महिषासुर एक बहुत ही शक्तिशाली राक्षस था जिसने भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि उसे कोई भी देवता या पुरुष नहीं मार सकता। इस वरदान के बाद, वह बहुत अहंकारी हो गया और उसने तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, और पाताल) में हाहाकार मचा दिया। उसने देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया और स्वयं स्वर्गलोक पर राज करने लगा।

जब सभी देवता महिषासुर के अत्याचारों से परेशान हो गए, तो उन्होंने त्रिदेवों (भगवान ब्रह्मा, विष्णु, और महेश) से मदद मांगी। तब, त्रिदेवों ने अपनी शक्तियों को मिलाकर एक महाशक्ति को जन्म दिया, जिन्हें देवी दुर्गा के रूप में जाना जाता है। देवी दुर्गा को हर देवता ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए। भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र, और भगवान इंद्र ने वज्र दिया।

इसके बाद, देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ नौ दिनों तक भयंकर युद्ध किया। इस दौरान महिषासुर ने अपने रूप बदलकर देवी को छलने का प्रयास किया, लेकिन देवी दुर्गा ने अपने विभिन्न रूपों और शक्तियों से उसे हराया। अंत में, नौवें दिन, देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया और सृष्टि को उसके आतंक से मुक्त किया।

यह जीत नवमी के दिन हुई, और इस जीत के सम्मान में, नवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। दशहरा का त्योहार इसी विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, जब भगवान राम ने रावण का वध किया था, जिसे विजयदशमी भी कहते हैं।

क्या आप नवरात्रि से जुड़े किसी और विषय के बारे में जानना चाहेंगे, जैसे इसके नौ रूप या विभिन्न राज्यों में इसे कैसे मनाया जाता है?

नवरात्रि के 9 दिनों में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। हर दिन एक विशेष रूप को समर्पित होता है।

नवरात्रि के 9 दिन  की पूजा :

पहला दिन: शैलपुत्री

यह देवी दुर्गा का पहला रूप हैं। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है। इनका वाहन वृषभ (बैल) है और इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल का फूल होता है।

दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी

देवी का यह रूप तपस्या और वैराग्य का प्रतीक है। इनके दाहिने हाथ में माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है।

तीसरा दिन: चंद्रघंटा

इस रूप में देवी के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। यह रूप शांति, साहस और निडरता का प्रतीक माना जाता है।

चौथा दिन: कूष्मांडा

यह माना जाता है कि देवी कूष्मांडा ने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसलिए इन्हें ‘सृष्टि की आदि शक्ति’ भी कहा जाता है।

पाँचवाँ दिन: स्कंदमाता

देवी का यह रूप भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता का है। इन्हें ममता और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

छठा दिन: कात्यायनी

देवी का यह रूप महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में जाना जाता है। इन्हें दुष्टों का नाश करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।

सातवाँ दिन: कालरात्रि

यह देवी का सबसे उग्र और भयानक रूप है, जो अंधकार और अज्ञान का नाश करता है। यह रूप बुराई का नाश करने का प्रतीक है।

आठवाँ दिन: महागौरी

यह देवी का शांत और सौम्य रूप है। महागौरी की पूजा से पापों का नाश होता है और जीवन में पवित्रता आती है।

नौवाँ दिन: सिद्धिदात्री

देवी का यह रूप सभी प्रकार की सिद्धियाँ (अलौकिक शक्तियाँ) देने वाला है। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

ये नौ रूप मिलकर देवी दुर्गा की पूर्ण शक्ति और उनके विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं।

नवरात्रि के नौ दिनों में हर देवी को एक विशेष रंग और प्रसाद चढ़ाने का भी महत्व है। यह रंग और प्रसाद देवी के गुणों और शक्तियों को दर्शाते हैं।

पहला दिन: शैलपुत्री

  • रंग: नारंगी  – यह रंग ऊर्जा और खुशी का प्रतीक है।
  • प्रसाद: गाय का घी।

दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी

  • रंग: सफेद  – यह शांति, पवित्रता और सादगी का प्रतीक है।
  • प्रसाद: शक्कर (चीनी)।

तीसरा दिन: चंद्रघंटा

  • रंग: लाल  – यह शक्ति, प्रेम और साहस का प्रतीक है।
  • प्रसाद: खीर या दूध से बनी मिठाई।

चौथा दिन: कूष्मांडा

  • रंग: शाही नीला – यह रंग समृद्धि और राजसी शक्ति का प्रतीक है।
  • प्रसाद: मालपुआ।

पाँचवाँ दिन: स्कंदमाता

  • रंग: पीला – यह खुशी, उत्साह और ज्ञान का प्रतीक है।
  • प्रसाद: केले।

छठा दिन: कात्यायनी

  • रंग: हरा  – यह प्रकृति, विकास और नई शुरुआत का प्रतीक है।
  • प्रसाद: शहद।

सातवाँ दिन: कालरात्रि

  • रंग: भूरा – यह रंग शक्ति, समर्पण और स्थिरता का प्रतीक है।
  • प्रसाद: गुड़।

आठवाँ दिन: महागौरी

  • रंग: बैंगनी  – यह रंग आध्यात्मिकता और ज्ञान का प्रतीक है।
  • प्रसाद: नारियल।

नौवाँ दिन: सिद्धिदात्री

  • रंग: मोरपंख हरा – यह रंग इच्छाओं की पूर्ति और नई उम्मीदों का प्रतीक है।
  • प्रसाद: तिल, चने और हलवा।

यह रंग और प्रसाद हर दिन की पूजा को और भी विशेष बनाते हैं।

भारत में माता के कई प्रमुख और प्रसिद्ध मंदिर हैं, जो लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र हैं। इनमें से कुछ सबसे महत्वपूर्ण मंदिर नीचे दिए गए हैं:

  • मैहर देवी मंदिर, जिसे शारदा माता मंदिर भी कहा जाता है, मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित एक बहुत प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यह मंदिर त्रिकूट पर्वत पर लगभग 600 फीट की ऊंचाई पर है।
  • विंध्याचल मंदिर, जिसे माँ विंध्यवासिनी मंदिर भी कहते हैं, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। यह एक प्रमुख शक्तिपीठ है और देवी दुर्गा को समर्पित है।
  • वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू और कश्मीर: त्रिकुटा पर्वत पर स्थित यह मंदिर भारत के सबसे लोकप्रिय शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ हर साल लाखों भक्त माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आते हैं।
  • ज्वाला देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित यह मंदिर देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहाँ कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि नौ ज्वालाएँ लगातार जलती रहती हैं, जो देवी के नौ रूपों का प्रतीक हैं।
  • कामाख्या मंदिर, असम: गुवाहाटी में स्थित यह मंदिर भी एक प्रमुख शक्तिपीठ है। यह भारत के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी मंदिरों में से एक माना जाता है। यहाँ देवी की मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि उनके ‘योनि’ रूप की पूजा की जाती है।
  • महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर, महाराष्ट्र: यह मंदिर देवी महालक्ष्मी को समर्पित है। यहाँ दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं, खासकर नवरात्रि के दौरान।
  • कालिका मंदिर, कालीघाट, पश्चिम बंगाल: यह मंदिर कोलकाता में हुगली नदी के किनारे स्थित है और देवी काली को समर्पित है। यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक है।
  • नैना देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश: यह मंदिर बिलासपुर जिले में स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहाँ देवी सती की आँखें गिरी थीं, इसलिए इस स्थान का नाम नैना देवी पड़ा।
  • करणी माता मंदिर, राजस्थान: बीकानेर के पास स्थित यह मंदिर “चूहों वाले मंदिर” के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहाँ हजारों चूहे रहते हैं, जिन्हें पवित्र माना जाता है।
  • अंबाजी माता मंदिर, गुजरात: यह मंदिर गुजरात के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक श्रीयंत्र स्थापित है।

यह कुछ सबसे प्रमुख मंदिर हैं, जहाँ नवरात्रि के समय विशेष पूजा-अर्चना और उत्सव होते हैं। नवरात्रि के दौरान यहाँ भारी भीड़ होती है, क्योंकि इस समय पूजा और उत्सव का विशेष महत्व होता है।

भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव

”भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव” 

भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव जिसे जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, एक वार्षिक हिंदू त्योहार है जो भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण के जन्म का  उत्सव मनाता है।

तिथि और महत्व

यह त्योहार हिंदू महीने भाद्रपद के कृष्ण पक्ष  की अष्टमी (आठवें दिन) को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर में पड़ता है।

श्री कृष्ण के  अवतार  ने अत्याचारी राजा कंस के शासन का अंत किया। भक्तों के लिए, यह त्योहार इस शाश्वत संदेश की याद दिलाता है कि बुराई पर हमेशा अच्छाई की जीत होगी। श्री कृष्ण का जीवन और शिक्षाएँ, विशेष रूप से भगवद गीता में पाई जाने वाली, प्रेरणा का एक स्रोत हैं, जो प्रेम, कर्तव्य और सत्य के महत्व पर जोर देती हैं।

 

कैसे मनाया जाता है

जन्माष्टमी खुशी और भक्ति का दिन है, जिसमें भारत और दुनिया भर के घरों और मंदिरों में उत्सव मनाए जाते हैं। इन समारोहों में अक्सर शामिल होते हैं:

  • उपवास और आधी रात की पूजा: कई भक्त दिन भर का उपवास रखते हैं, जो आधी रात को तोड़ा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि श्री कृष्ण का जन्म इसी समय हुआ था। रातभर, भक्त भक्ति गीत (भजन) गाते हैं और मंत्रों का जाप करते हैं।
  • सजावट और पूजा: घरों और मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। बाल श्री कृष्ण की मूर्तियों (बाल गोपाल) को नहलाया जाता है, नए कपड़े और गहने पहनाए जाते हैं, और एक खूबसूरती से सजे झूले (झूला) में रखा जाता है।
  • दही हांडी: महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में, यह एक लोकप्रिय और ऊर्जावान परंपरा है। यह श्री कृष्ण के बचपन की शरारतों को दर्शाती है, जहाँ वह और उनके दोस्त अपनी माताओं द्वारा ऊँचाई पर लटकाई गई मक्खन की मटकी से मक्खन चुराने के लिए मानव पिरामिड बनाते थे। युवाओं की टीमें (गोविंदा) जमीन से काफी ऊँचाई पर लटकी दही या मक्खन की मटकी को तोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाते हैं।
  • सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ: श्री कृष्ण के जीवन के एपिसोड पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियाँ, जिन्हें रासलीला या श्री कृष्ण लीला के नाम से जाना जाता है, कई जगहों पर आयोजित की जाती हैं, खासकर मथुरा और वृंदावन में, जो उनके जन्म और शुरुआती जीवन से जुड़े स्थान हैं।
  • विशेष प्रसाद: विशेष व्यंजन, विशेष रूप से दूध-आधारित मिठाइयाँ और माखन मिश्री (मक्खन और चीनी), जो श्री कृष्ण के पसंदीदा थे, तैयार किए जाते हैं और देवता को प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाते हैं। 56 व्यंजनों का एक भव्य भोग, जिसे छप्पन भोग के नाम से जाना जाता है, भी एक लोकप्रिय परंपरा है।

भगवान श्री कृष्ण का प्रमुख मंत्र

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”  हिंदू धर्म का एक बहुत ही पूजनीय और शक्तिशाली मंत्र है। इसे द्वादशाक्षरी मंत्र या “बारह-अक्षर वाला मंत्र” भी कहते हैं, जो भगवान श्री कृष्ण (जिन्हें वासुदेव भी कहा जाता है) को समर्पित है।

 

अर्थ और महत्व

  • ॐ (Om): यह ब्रह्मांड की आदिम ध्वनि है, जो परम वास्तविकता का प्रतीक है। माना जाता है कि इसी पवित्र ध्वनि से पूरी सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।
  • नमो (Namo): यह संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है “नमस्कार,” “प्रणाम,” या “आदर।” यह भगवान के सामने झुकने या समर्पण को दर्शाता है।
  • भगवते (Bhagavate): यह भगवान को संदर्भित करता है, जो छह दिव्य गुणों वाले पूजनीय देवता हैं: ज्ञान, शक्ति, बल, यश, सौंदर्य और वैराग्य। इसका अर्थ है “दिव्य” या “भगवान को।”
  • वासुदेवाय (Vasudevaya): यह भगवान श्री कृष्ण का नाम है। इस नाम का शाब्दिक अर्थ “वासुदेव के पुत्र” (उनके पिता का नाम) है, लेकिन इसका एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है: “वह जो सभी प्राणियों में निवास करते हैं और जिसमें सभी प्राणी निवास करते हैं।”

तो, इस पूरे मंत्र नमो भगवते वासुदेवाय” का अर्थ है: हे भगवान वासुदेव, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।”

उद्देश्य और लाभ

इस मंत्र का जाप भगवान विष्णु और उनके अवतारों, विशेष रूप से श्री कृष्ण से जुड़ने का एक सीधा और शक्तिशाली तरीका माना जाता है। भक्तों का मानना है कि इसका नियमित जाप करने से:

  • मन और आत्मा शुद्ध होती है: यह जप करने वाले को नकारात्मक विचारों और अहंकार से मुक्त करने में मदद करता है, जिससे मन में शांति और स्पष्टता आती है।
  • मुक्ति (मोक्ष) मिलती है: यह आध्यात्मिक मुक्ति का मंत्र है, जो भक्त को जन्म और मृत्यु के चक्र से परे जाने में मदद करता है।
  • भक्ति बढ़ती है: यह भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण को मजबूत करता है, जिससे आध्यात्मिक संबंध गहरा होता है।
  • सुरक्षा और इच्छाओं की पूर्ति: ऐसा माना जाता है कि यह सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा करता है और सही इच्छाओं को पूरा करने में मदद करता है।

यह हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा का एक मुख्य मंत्र है और इसका जाप दुनिया भर में लाखों लोग प्रार्थना, ध्यान और दैनिक अनुष्ठानों के दौरान करते हैं।

भारत में प्रमुख कृष्ण मंदिर:-

(1)- द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका, गुजरात

यह भारत के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है। यह चार धामों में से एक है, और भगवान कृष्ण के उस रूप को समर्पित है जहाँ उन्होंने द्वारका नगरी की स्थापना की थी। मंदिर का मुख्य शिखर 43 मीटर ऊंचा है और इस पर एक विशाल ध्वज है जिसे दिन में कई बार बदला जाता है।

(2)- श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर, मथुरा, उत्तर प्रदेश

यह वह पवित्र स्थान है जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। यह मंदिर उसी जेल की कोठरी पर बना है, जहाँ कृष्ण ने जन्म लिया था। यह दुनिया भर के कृष्ण भक्तों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है।

(3)- बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन, उत्तर प्रदेश

यह वृंदावन के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति त्रिभंग मुद्रा में है, जो बेहद आकर्षक है। माना जाता है कि मूर्ति में कृष्ण और राधा दोनों का दिव्य रूप समाहित है।

(4)- प्रेम मंदिर, वृंदावन, उत्तर प्रदेश

यह एक आधुनिक लेकिन भव्य मंदिर है, जिसे जगद्गुरु कृपालु महाराज ने बनवाया था। यह सफेद संगमरमर से बना है और इसकी सुंदरता और नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर में कृष्ण और राधा के जीवन से संबंधित झांकियाँ और लीलाएं दिखाई गई हैं।

(5)- गोविंद देव जी मंदिर, जयपुर, राजस्थान

यह मंदिर जयपुर के सिटी पैलेस परिसर में स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर में स्थापित भगवान कृष्ण की मूर्ति को जयपुर के महाराजा जय सिंह द्वितीय ने वृंदावन से लाकर स्थापित करवाया था। यह मूर्ति जयपुर के लोगों के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।

(6)- इस्कॉन मंदिर (श्री राधा कृष्ण मंदिर)

इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) द्वारा पूरे विश्व में सैकड़ों इस्कॉन मंदिर बनाए गए हैं। इनमें से प्रमुख मंदिर वृंदावन, दिल्ली, बैंगलोर और मायापुर में हैं। ये मंदिर अपनी भक्तिपूर्ण वातावरण, कीर्तन और कृष्ण भक्ति के प्रचार के लिए जाने जाते हैं।

(7)- जगन्नाथ मंदिर, पुरी, ओडिशा

यह मंदिर भगवान कृष्ण के एक विशेष रूप जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को समर्पित है। यह भी चार धामों में से एक है। रथ यात्रा उत्सव के लिए यह मंदिर विश्वभर में प्रसिद्ध है, जिसमें भगवान की मूर्तियों को विशाल रथों में बिठाकर यात्रा निकाली जाती है।

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मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो-सूरदास

                                                                                                                                                                           Result Plot

॥मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो |
भोर भयो गैयन के पाछे,

भोर भयो गैयन के पाछे,

 मधुवन मोहिं पठायो ।

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

चार पहर बंसीबट भटक्यो,

साँझ परे घर आयो ॥

मैं बालक बहिंयन को छोटो,

छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं,

ग्वाल बाल सब बैर परे हैं,

बरबस मुख लपटायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

तू जननी मन की अति भोरी,

इनके कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है,

जिय तेरे कछु भेद उपजि है,

 जानि परायो जायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥

यह लै अपनी लकुटि कमरिया,

बहुतहिं नाच नचायो ।
‘सूरदास’ तब बिहँसि जसोदा,

लै उर कंठ लगायो ॥

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो |

भोर भयो गैयन के पाछे,

 मधुवन मोहिं पठायो ।

भोर भयो गैयन के पाछे,

 मधुवन मोहिं पठायो ।

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ॥